(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.258. अध्यायः 258
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति आकाशादिभूतगुणादिप्रतिपादकव्यासवाक्यानुवादः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

व्यास उवाच। 12-258-0x(6264)(75686)
द्वन्द्वासि मोक्षजिज्ञासुरर्थधर्मानुतिष्ठतः।
वक्रा गुणवता शिष्यः श्राव्यः पूर्वमिदं महत्॥ 12-258-1(75687)
आकाशं मारुतो ज्योतिरा--पृथ्वी च पञ्चमी।
भावाभावौ च कालश्च सर्वभूतेषु पञ्चसु॥ 12-258-2(75688)
अन्तरात्मकमाकाशं तन्मयं श्रोत्रमिन्द्रियम्।
तस्य शब्दं गुणं विद्यान्मुनिः शास्त्रविधानवित्॥ 12-258-3(75689)
चरणं मारुतात्मेति प्राणापानौ च तन्मयौ।
स्पर्शनं चेन्द्रियं विद्यात्तथा स्पर्शं च तन्मयम्॥ 12-258-4(75690)
तापः पाकः प्रकाशश्च ज्योतिश्चक्षुश्च तन्मयम्।
तस्य रूपं गुणं विद्यात्तमोनाशकमात्मवान्॥ 12-258-5(75691)
प्रक्लेदो द्रवता स्नेह इत्यपामुपदिश्यते।
[असृङ्भज्जा च यच्चान्यत्स्निग्धं विद्यात्तदात्मकम्॥]
रसनं चेन्द्रियं जिह्वा रसश्चापां गुणो मतः॥ 12-258-6(75692)
संघातः पार्थिवो धातुरस्थिदन्तनखानि च।
श्मश्चु रोम च केशाश्च सिरा स्नायु च चर्म च॥ 12-258-7(75693)
इन्द्रियं घ्राणसंज्ञातं नासिकेत्यभिसंज्ञिता।
गन्धश्चैवेन्द्रियार्थोऽयं विज्ञेयः पृथिवीमयः॥ 12-258-8(75694)
उत्तरेषु गुणाः सर्वे सन्ति पूर्वेषु नोत्तराः।
पञ्चानां भूतसङ्घानां संततिं मुनयो विदुः॥ 12-258-9(75695)
मनो नवममेषां तु बुद्धिस्तु दशमी स्मृता।
एकादशस्त्वन्तरात्मा स सर्वः पर उच्यते॥ 12-258-10(75696)
व्यवसायात्मिका बुद्धिर्मनो व्याकरणात्मकम्।
कर्मानुमानाद्विज्ञेयः स जीवः क्षेत्रसंज्ञकः॥ 12-258-11(75697)
एभिः कालात्मकैर्भावैर्यः सर्वैः सर्वमन्वितम्।
पश्यत्यकलुयं बुद्ध्या स मोहं नानुवर्तते॥ ॥ 12-258-12(75698)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 258॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-258-1 द्वन्द्वान्निर्मोक्षजिज्ञासुरिति ध. पाठः॥ 12-258-9 उत्तरेषु भूतेषु पूर्वभूतगुणाः सन्ति॥ 12-258-11 मनोव्याहरणात्मकमिति ट. थ. पाठः॥


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